Saturday, April 16, 2016

आज पहले से कहीं अधिक ध्यान की जरूरत है!

ध्यान की इतनी जरूरत है कि यह बात लगभग जिंदगी और मौत की हो गई है। अतीत में यह विलासिता थी; कुछ लोग -- एक बुद्ध, एक महावीर, एक कृष्ण -- उसमें रुचि रखते थे। अन्य दूसरे लोग स्वाभाविक रूप से मौन, शांत, प्रसन्न और स्वस्थ थे। उन्हें ध्यान के बारे में सोचने की जरूरत नहीं थी, अचेतन ढंग से वे ध्यान कर रहे थे।

जिंदगी बड़ी शांत चल रही थी, बहुत धीमे चल रही थी कि मूढ़ से मूढ़ व्यक्ति भी उससे तालमेल बिठाने में सफल हो जाते थे। अब बदलाव बहुत तेज गति से हो रहा है -- इतनी तेज गति से कि अति बुद्धिमान व्यक्ति भी इससे तालमेल बिठाने में सफल नहीं हो पा रहे हैं।

रोजमर्रा की जिंदगी कठिन हो गई है, और तुम्हें फिर से सीखना है, बार-बार सीखना है। अब तुम सीखना कभी भी रोक नहीं सकते; यह जिंदगी भर की प्रक्रिया है। मरने के क्षण तक तुम्हें सीखते रहना है, सिर्फ तभी तुम स्वस्थ रह सकते हो और अपनी विक्षिप्तता को टाल सकते हो। आज दवाब बहुत बड़ा है, चार गुना बड़ा!

इस दवाब को शिथिल कैसे किया जाये?

तुम्हें प्रयत्नपूर्वक ध्यान के क्षणों में जाना होगा। अगर व्यक्ति दिन में कम से कम एक घंटा ध्यान नहीं कर रहा है, तब विक्षिप्तता कोई दुर्घटना नहीं होगी क्योंकि वह स्वयं इसे पैदा कर लेगा।

व्यक्ति को कम से कम एक घंटे के लिये दुनिया से विदा होकर अपने अंतरतम में खो जाना चाहिये। एक घंटे के लिये उसे इतना अकेला हो जाना चाहिये कि कुछ भी उसे परेशान न करे -- न धन, न विचार, न कल्पनायें -- कुछ भी नहीं; एक घंटे के लिये उसकी चेतना में कोई प्रदूषण नहीं। 

और यह उसे पुनर्जीवन देगा, और ताजा कर देगा। यह उसमें ऊर्जा के नये स्रोत छोड़ देगा, और वह दुनिया में फिर से युवा, विश्रामपूर्ण, अधिक सीखने में सक्षम, विस्मय से भरी आँखों और हृदय में अधिक निस्तब्धता के साथ फिर से बच्चे की तरह हो जायेगा।

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